महाराज हैहय के बाद युवराज धर्म गद्दी पर बैठे I "यथा नाम तथा गुण" के वे पालक रहे I उन्होंने प्रदेश में शांति , व्यवस्था और न्याय क़ी स्थापना क़ी I इनके नेत्र नाम का एक पुत्र था जो महाराज धर्म के बाद सिहासनासीन हुए I इन्होने अपने पिता के शासन को अधिक सुद्रढ़ बनाया तथा प्रजा के दुःख सुख क़ी ओर अधिक सक्रिय रहे I

महाराज धर्म के पश्चात् कुन्ती महाराज बने I उनका विवाह विद्यावती से हुआ I पत्नी की प्रेरणा से महाराज कुन्ती ने धार्मिक कार्यो में अधिक रूचि ली तथा राज्य को और भी अधिक सुद्रण बनाया I महाराज कुन्ती के सौहंजी नाम का पुत्र हुआ जो बाद में गद्दी का मालिक बना I महाराज सौहंजी ने सौहंजिपुर नाम का एक नया नगर बसाया और प्रतिष्ठानपुर से हटाकर इस नगर को अपनी राजधानी बनाया I आजकल सौहंजिपुर sahajnava नाम से विख्यात है जो उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के अंतर्गत आता है I इनकी महारानी चम्पावती से महिष्मान नाम का पुत्र उत्तपन्न हुआ I

महाराज महिष्मान बड़े प्रतापी और वीर पुरुष थे I इन्होने दक्षिण प्रदेश का बहुत - सा छेत्र अपने अधिकार में कर लिया तथा विजित प्रदेश में आर्य संस्कृति और सभ्यता का बहुत प्रचार किया I महाराज महिष्मान ने अपने नाम पर महिष्मति नामक नगर की स्थापना की जिसे अपने राज्य की राजधानी बनाया गया I यह नगर आजकल औंकारेश्वर या मानधाता नाम से प्रसिद्ध है जो निमाड़ जिले में पश्चिमी रेलवे की खंडवा - अजमेर शाखा पर स्थित औंकारेश्वर रोड से सात मील दूर नर्मदा तट पर बसा हुआ है I इनकी महारानी सुभद्रा से भद्रश्रेय नाम का पुत्र उत्तपन्न हुआ I

महाराज महिष्मान के बाद जब भद्रश्रेय शासन पर आरुढ़ हुए तब हैहयवंशियो का राज्य बनारस से महिष्मति के आगे तक फैला हुआ था I सूर्यवंशियो और चंद्रवंशियो की अनबन प्रारंभ से ही चली आ रही थी I इसी को द्रष्टिगत करते हुए महाराज भद्रश्रेय ने अपनी राजधानी महिष्मति से हटाकर बनारस स्थापित की जो कुछ समय पश्चात् सूर्यवंशियो से लोहा लेने का कारण बना , क्योंकि उसके निकट अयोध्या सूर्यवंशियो की राजधानी थी I इस लोहा लेने का परिणाम यह निकला कि हैहयवंशियो को सदैव के लिए बनारस से हाथ धोना पड़ा I राजधानी परिवर्तन के पीछे उनकी धार्मिक प्रवृति अधिक प्रबल रही I इनकी महारानी दिव्या से युवराज दर्मद उत्तपन्न हुए I
  
 
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